"अपनी कविता शुरू करने से पहले, मैं अपने नानाजी की स्मृति को नमन करती हूँ। मैं अपनी मम्मी, प्रमोद भैया-भाभी और सभी बड़े भाई-बहनों के स्नेह, अपनी मार्गदर्शिका संध्या पांडे मैम के निर्देशों और अपने पति के समर्थन के लिए दिल से आभार व्यक्त करती हूँ।
पिछले 2४ वर्षों के इस शिक्षण और कला सफर में हर एक दोस्त , अपने स्टूडेंट के सपोर्ट, शहर और संस्थान
के लिए दिल से आभारी हु, मिले लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड के इस सम्मान के साथ, मैं अपना यह सफर और कविता भगवान के चरणों में समर्पित करती हूँ।"
मुझे मयंक मामा जी की कविता की कुछ लाइन याद आ रही है जो आपसे साझा करना चाहती हो
"मैं हवा हूं भला यह कैसे बता पाऊंगी ?
मुझ में किस फूल ने कितनी है मिलाई खुशबू II
आइये इसी के साथ सुनते हैं मेरी एक स्वरचित कविता
जीवन के कैनवास पर मेरा एक अंगूठा सफर
ख़्वाब तो देखा था कि एक आर्किटेक्ट बनूँगी मैं,
पर नियति ने चुना कि एक नया इतिहास रचूँगी मैं।
मल्टीमीडिया डिज़ाइनर बन, जब पहला कदम बढ़ाया था,
दिल्ली IITF फेयर में, अपने नाम से बुंदेलखंड प्रेजेंटेशन चलाया।
उसी हुनर की बदौलत वो पावन सौभाग्य मैंने पाया,
जब 'इंस्टीट्यूट ऑफ म्यूज़िक एंड फाइन आर्ट्स' को बतौर फाउंडर सजाया ।
विश्वविद्यालय के गलियारों से फिर आगे बढ़ा ये सफ़र,
नेहरू युवा केंद्र से मिले संस्कारों संग रंगों और ज्ञान ले मेरे विद्यार्थी भी बढ़े प्रखर।
झांसी महोत्सव के दौरान जब आयोजक की ज़िम्मेदारी निभाई,
राष्ट्रीय संग्रहालय में कला प्रदर्शनी और कार्यशाला की अलख जगाई।
सागौन की लकड़ी से ५० फ्रेम बनवाए, ताकि कोई कलाकार मजबूर न रहे,
बिना किसी खर्च के, हर हुनरमंद अपनी एकल प्रदर्शनी लगाने में मसरूर रहे।
कलम थामी, रंग बिखेरे, और कला को ही जिया,
ज़िंदगी ने हर मोड़ पर एक नया तजुर्बा दिया।
मेरे पहले बैच के बच्चों ने जब KV, APS, नवोदय के इम्तिहान पार किए,
मेरी थ्योरी, मेरा पढ़ाना सार्थक होगया, जब उन्होंने अपनी मंज़िल के दीदार किए।
गर्व है मुझे कि हमने उन्हें कुछ ऐसा सिखाया,
अमर,रविंद्र,दीपक, मुईन और रीता जैसे शिष्यों ने खुद शिक्षक बन एक शिक्षक का मान बढ़ाया
शादी के बाद जब छूटा वो शहर, और दिल्ली का रुख किया,
वहाँ भी हुनर के दम पर 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में नाम किया।
फिर बैंगलोर की नई ज़मीन पर एक नया सफ़र शुरू हुआ,
जहाँ भाषा की दीवारें थीं, पर हौसला टस से मस न हुआ।
चित्रकला परिषद से आगे बढ़, जब स्कूलों का रास्ता अपनाया,
रायन, केवी, और एपीएस के बच्चों को सोशल यूटिलिटी वर्क का पाठ पढ़ाया।
बच्चों को कोचिंग की ज़रूरत न पड़े, ऐसा दिल से ज्ञान दिया,
हर एक सोशल अवेयरनेस कैंपेन को पूरी शिद्दत से अंजाम दिया।
बनकर पीजीटी टीचर, भारत की कला-संस्कृति का इतिहास दोहराया,
११वी-१२वीं में वर्क एजुकेशन में बच्चों को जीने का सही सलीका सिखाया।
हॉलिस्टिक पर्सनैलिटी डेवलपमेंट और दैनिक जीवन के छोटे-छोटे काम,
सिखाकर हर बच्चे को देश का एक ज़िम्मेदार नागरिक बनाया।
नागार्जुन विद्यानिकेतन में रहकर कैंब्रिज कल्चर को भी जाना,
उनके सान्निध्य में सीखा कैसे हर एक नया हुनर है अपनाना।
फिर माता-पिता के आशीर्वाद से, 'जे.पी. इंस्टीट्यूट' की नींव सजाई,
ऑनलाइन-ऑफलाइन नेशनल टैलेंट हंट कराकर एक नई अलख जगाई।
कवि, नर्तक, गायक, वादक—हर कलाकार का वहाँ सम्मान किया,
कला की इस पावन वेदी पर अपना सर्वस्व दान किया।
देश-विदेश के शिक्षार्थियों को आज भी पूरी लगन से पढ़ा रही हूँ,
हर उम्र के लोगों को, २८ राज्यों की फोक आर्ट सिखा रही हूँ।
पीएचडी के दौरान वेद-पुराणों से जो पाया है अनमोल ज्ञान,
जन-जन तक उसे पहुँचाना ही अब मेरे जीवन का है अरमान।
कितने चेहरे, कितनी यादें, समेटे हैं इस दिल में,
हर एक कोना महक उठा है आज इस महफ़िल में।
बनना कुछ और था शायद, पर उसने कुछ और बनाया,
आज इस लाइफटाइम अचीवमेंट ने पूरे सफ़र का मान बढ़ाया।

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